कानपुर पुलिस की गद्दारी ने ली 8 पुलिसकर्मियों की जान।चर्चित हत्यारा विकास दुबे की हिस्ट्रीशीट से ही मालूम होता है।कि व दुर्दांत मानसिकता का अपराधी है।सन 1994 में एक किसान की हत्या ने नाम आने के बाद गवाह न होने से मुकदमा से बरी होने के बाद मानो अपराध की फेहरिस्त बढ़ाने के दौरान प्रदेश में भाजपा कार्यकाल में दर्जा प्राप्त संतोष शुक्ला की हत्या शिवली थाने में कई गयी।ऐसे अपराधी को संरक्षण देना ही।दिनाँक 3/7/2020 को काली रात भी आ गयी जो सी ओ समेत आठ पुलिसकर्मियों की नृसंश हत्या से खत्म हुई।और इसके पीछे की कहानी पर नजर डाले तो पुलिस ही पुलिस को जबरन मरवाने ले जाती नजर आती है।वो भी तब जब एक भी गलती विभाग के कई लोगो की जान पर बन सकती थी।लेकिन इस पूरे प्रकरण में तो पुलिस ने गांव की बिजली शट डाउन करवा दी।और अपने ही महकमे के लोगो की हत्या करवा दी ।क्यों न कह जाए कि उ प्र पुलिस विभाग की मुह परस कालिख पोत दी उन्ही के महकमे के दरोगा ने।
उ प्र पुलिस को कानून से खेलकर अपराधियों का संरक्षण देना पड़ा महंगा