कानपुर। शहर भ्रष्ट पुलिस कर्मियों व डिजाइनर पत्रकारों के हवाले 

क्या आजादी से गुलामी भली।जी हां ये एक तीखा सवाल है। जो सोचने पर आपको विवश जरूर करेगा। शहर के नौबस्ता थाना क्षेत्र में एक पत्रकार को आत्महत्या करने लिए विवश होना पड़ा ।क्या ये प्रकरण खाकी को कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगता जहां वजह भी खाकी।आज कानपुर शहर में छाए मुद्दों पर केवल खाकी ही निशाने पर । संजीत हत्याकांड में महिला आईपीएस अर्पणा गुप्ता की विदाई निलंबन से अपने आप में बेहद शर्मनाक है।दरसअल साउथ पुलिस अपने मूड से काम करती है । अफसर को मासिक चौथ के एवज में फुल मौज का सलूफा थानेदारो और उनके कारखासो को खूब भाने लगा है।नतीजन निलंबित बर्रा इंस्पेक्टर रणजीत राय के ओवर कॉन्फिडेंस की वजह भी संजीत हत्याकांड की वजह बना। भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस नीति के मुखिया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा उक्त हत्याकांड के बाद दोषी पुलिसकर्मियों पर सरकारी हंटर चलने के बाद भी कोई सबक नहीं लिया ।नौबस्ता के पत्रकार चंदन कठेरिया आत्महत्या प्रकरण में भी अब तक दोषी थानाध्यक्ष व पुलिसकर्मियों पर अभी तक कोई भी विभागीय दंडात्मक कार्यवाही नहीं को गई।जबकि पत्रकार द्वारा लिखे गए सुसाइड नोट में इन्हे दोषी ठहराया गया है।मामले की जड़ यानी आरोपी सिपाही के घूसखोरी के आरोपों को क्यों पचाना चाहती है खाकी।अपराध को अंजाम दे, मनचाहा लगान दे कि तर्ज पर जारी खेल को आखिर भ्रष्टाचार के बगीचे को कौन सींच रहा है। डिजाइनर पत्रकार या प्रशासनिक अमला यह बेहद गंभीर सोचनीय विषय है थाने में लागू कारखासो की प्रथा ने न्याय व्यवस्था को अपंग कर दिया है। चंद रुपयों की खातिर दायित्वों को ताड़ पर रख दिया जाता है। अधिकांश कारखास हमराह ड्यूटी नाम के शिकार है।थाने चौकी में अंगद की तरह पांव जमा चुके ऐसे कारखासो के कर्मो का भुक्तभोगी थाने के अधिकांश सिपाही, व दरोगा स्टाफ को बनना पड़ता है। हालांकि एस पी साउथ दीपक भूकर कि कठोर कार्यशैली से तस्वीर कुछ हद तक सुधरी पर लय तक नहीं आयी।आज भी साउथ में हुक्काबार, स्पा सेन्टर दुकानों में अवैध शराब की कैंटीन ,अवैध ऑटो स्टैंड नशीले इंजेक्शन जैसे कारोबार खाकी के इकबाल को खुली चुनौती दे रहे है।
(1)पत्रकार द्वारा किए गए आत्महत्या के प्रयास की मुख्य वजह प्रथम दृष्टया पुलिस कि कारगुज़ारी का खुलासा करना 
(२) तथा इसके पश्चात पत्रकार चंदन कठेरिया पर झूठा मुकदमा लगाकर उसे जेल भेजना। और उसे भद्दी भद्दी गालियां देना
(३) पत्रकार चंदन कठेरिया इन्हीं सब पुलिसिया कर्यावहीं से परेशान होकर एक सुसाइड नोट में उन पुलिसकर्मियों के नामों को उजागर करता है जिनकी वजह से वह आत्महत्या कर रहा है।) जिसका नतीजा की वों अभी तक अस्पताल में भर्ती है ।और एक भी पुलिसकर्मी उसका बयान लेने  आज तक नहीं गए।आखिर कानून ऐसी वारदात पर क्या कहता है।सही कहा किसी ने कानून तो पुलिस की जेब में है ।(लोक छाया समाचार पत्र)