कानपुर। आरटीओ विभाग को बाप की जागीर समझने वाले अफसर इन दिनों विजिलेंस के भय से खौफजदा है। खौफ से मुक्ति पाने वास्ते अफसरों ने परिवहन आयुक्त के आगे नतमस्तक होने से भलाई समझी है। पत्र के माध्यम से उन्हें समस्याओं से अवगत कराया है। विजिलेंस की जांच में विभाग में कार्यरत प्राइवेट कर्मी रडार पर पर है। जिनकी मासिक वेतन का मुद्दा प्राथमिकता पर है। उल्लेखनीय है कि आरटीओ विभाग दलाली के लिए लम्बे अर्से से चर्चा में है। जनता से सीधे जुड़े कार्यो में दो कार्य प्रमुख है। एक डीएल व दूसरा वाहनों की फिटनेस पनकी स्थित फिटनेंस सेंटर अफसरों की पैतृक जागीर सिद्ध होता आया है। सेंटर पर चंद दिन पूर्व विजिलेंस टीम की छापेमारी में कार्यरत आरआई बाल-बाल बच गया था व मौके से भागने में सफल रहा था। विभागीय सूत्रों की मानें तो छापेमारी के कारण काली कमाई में खासी दिक्कतें आ रही थी। एक सुर में विरोध की उठती आवाज के मद्देनजर आरटीओ प्रशासन ने पूरे घटना की रिपोर्ट परिवहन आयुक्त को लिखित पत्र के जरिए 31 अक्टूबर को दी। पत्र के माध्यम से कहा गया है कि विजिलेंस द्वारा जारी छापेमारी से विभाग का स्टाफ दहशत में है। स्टाफ की कमी वास्ते प्राइवेट कर्मचारियों से काम लिया जा रहा है। यदि हालात यूं ही रहे तो काम करना मुश्किल होगा। विभागीय सुगबुगाहट पर गौर करें तो प्राइवेट कर्मचारियों की नियुक्ति व उनके वेतन संग्रह की बात तो पत्र में अंकित है लेकिन इसकी अनुमति शासन स्तर पर न लिया जाना विभागीय भष्ट्राचार को उजागर करती है। मामले में सबसे अहम बात यह है कि आखि रवह स्थानीय आरटीओ अफसर कौन है जो अपने वेतन से दो दर्जन कर्मचारियों को वेतन बांट रहा है। भती प्रक्रिया से पहले शासन स्तर पर सूचना क्यों नहीं दी गयी है। पूर्व एआरटीओ सुनीता वर्मा पर चले सरकारी चाबुक के प्रकरण से भले ही भष्ट्र अफसरों ने कोई नसीहत न ली हो पर जीरो टॉलरेंस की नीति का बखान करने वाले
''सीएम योगी भी शायद ऐसे निकम्मे अफसरों के आगे पस्त दिखाई दे रहे है। इसमें कोई शक नहीं।“